रविवार, 20 नवंबर 2011

गेशे जप्पा उपन्यास : डा नीरजा माधव

गेशे जप्पा उपन्यास : डा नीरजा माधव

गेशे जप्पा उपन्यास का पाठ
    उपन्यास की शक्ल में उतरा तिब्बत का दर्द । निरन्तर में डा निरता का उपन्यास पाठ

   अक्सर कहा जाता है कि कहानी और कविता का रिश्ता दिल से ज्यादा होता है ,उपन्सास भी इस मिथक से अछूता नहीं है । कभी कभी उपन्यास की विधा भाव प्रधान से ज्यादा विचार प्रधान रूप में सामने आती है जिसमें पाठकों के लिए सर्वथा जुदा अनुभव होता है।
   प्रबुद्ध पाठक वर्ग ऐसे ही अनुभव से गुजरा है। मोका था स्वराज भवन,भोपाल में आयोजित निरन्तर श्रृंखाला के तहत हुए डा नीरजा माधव का उपन्यास पाठ । मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी ने मशहूर उपन्यासकार डा नीरजा माधव के उपन्यास गेशे जप्पा का पाठ । इस अवसर पर कथाकार मालती जोशी उपस्थित थी । अपने आप में यह उपन्यास न केवल तिब्बत की छटपटाहट को व्यक्त करता है बल्कि तिब्बत के प्रति विश्व स्तर पर छाई चुप्पी की तरफ भी इशारा करता है ।यह सच है कि शताब्दियों से बोद्ध धर्म की परंपराऔं,आस्थाऔं,निष्ठाऔं के प्रति  समर्पित यह देश सेकुलर देशों की भीड मे अपना एक चरि़त्र रखता है । धार्मिक और सामाजिक स्तर पर भी इस देश के अपने संस्कार है । इन सभी राजनीतिक,सांस्कतिक और भोगोलिक बिन्दुओं को कथारस में समेटता यह उपन्यास इस पूरे मामलs पर कई विचारणीय प्रश्न छोडता है ।
            मालती जोशी ने इसे अव्दितिय उपन्यास  बताया । इस जरिये उपन्यासकार राष्टीय और अंतराष्टीस विचारों और चुनोतियों के प्रति सजग दिखाई देती है। डा शंकर सोनाने  ने कहा कि यह उपन्या रवीन्द्रनाथा टैगोर के उपन्यास गोरा की याद दिलाता है । महाश्‍वेता देवी ने भी बंगाल में आदिवासियों के हित संरक्षण के लिए इसी तरह का कार्य किया है। तिब्बत समस्सा लेकर डा सोनाने ने 1975 मे लगभगग दस हजार लोगों से मतदान प्राप्त कर नेपाल सरकार को भेजे थे ,जो अब बहुत पुरानी बात हो गई है । उन्होने डा नीरता के उपन्यास गेसै जप्पा के फिल्मांकन की बात भी की कि इस उपन्यास पर बेहतर फिल्म सकती है । इसे सरकार बना सकती है या कोई निदेशक । 

आदिवासी लोक कथाए

 
आदिवासी लोककथाएं ”  इस पुस्‍तक में आदिम जनजाति समुदाय की मिथक कथाएं है। ये कथाए आदिम जनजाति समुदाय में वाचिक परम्‍परा के अन्‍तर्गत व्‍याप्‍त है ,जिन्‍हें संभवत: अब तक लिपि‍बद्ध नहीं किया गया था । मुझे लगा कि इन कथाओं की खोज की जाकर इन्‍हें एक स्‍थान पर एकत्र की जाए । इन बिखरी हुई मिथक कथाओं को सिलसिलेवार लिपिबिद्ध किया गया है।    ये कथाएं रिगवेद की स्‍मरण दिलाती है। इसका कारण यह हो सकता है कि जनजाति समुदाय आदि समय से सूर्य,चन्‍द्रमा,अग्नि,जल,वायु आकाश,पेड पौधे इसी तरह वे पूजा किया करते थे और आज भी कर रहे है।
प्रकाशक ,अखिल भारती 3014,चर्खेवालान,दिल्‍ली-110006

                                  कृष्‍णशंकर

”लावा ” उपन्‍यास

picture-063
 उपन्‍यास ” लावा ‘ आया है।
कल्‍पना प‍ब्‍कलेशन 157 दूसरी मंजि‍ल,चांदपोल बाजार
उदयपुर राजस्‍थान से प्रकाशि‍त ा लावा, चाणक्‍य
के सम्‍पूर्ण जीवन पर आधारि‍त उपन्‍यास हैा लावा
में आप पाएंगे चाणक्‍य के सीने में खलबलाता वह
लावा जो नन्‍द के समुचे वंश को समाप्‍त करने के
लि‍ए लालायि‍त होता हैा लावा जो प्रति‍शोध जगाता
हैा लावा जो चाणक्‍य को ज्‍वालामुखी बनाता हैा
लावा जो चाणक्‍य को महत्‍वाकांक्षी बनाता हैा
लावा जो चाणक्‍य को अपने लक्ष्‍य तक पहुंचाता हैा
लावा जब तक सीने मं नहीं व्‍यक्‍ति‍ अपने लक्ष्‍य
तक नहीं पहुंच सकता ा लावा जो प्रेम का भी
बलि‍दान देने की शि‍क्षा देता हैा लावा जो देश प्रेम
के लि‍ए प्रेरि‍त करता हैा यह वह ”लावा” जो हाथ
में उठाते ही पूरा न पढने तक हाथ से नहीं छूटताा
आप अवश्‍य पढे ा
     आपका अपना
    कृष्‍णशंकर सोनाने

उभरती हुई शायरा : नुसरत मेंहदी

picture-001-
 सलीम कुरैशी
 उर्दू साहित्य जगत की जानीमानी प्रसिद्ध शायरा नुसरत मेंहदी का जन्म 01 मार्च 1965 को नगीना जिला बिजरौर (उत्तर प्रदेश) में हुआ । उन्होंने अंग्रेजी में एम.ए. और बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी से बी.एड किया । शायरी के साथ-साथ उनके मज़ामीन कहानियाँ नाटक आदि भी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। शासकीय सेवा में रहते हुए भी अदब व शायरी की दिलोजान से सेवा कर रही है। जहाँ तक आकाशवाणी और दूरदर्शन का संबंध है वह उनको अपने कार्यक्रमों में अक्सर बुलाते हैं उनकी रचनाएं प्रसारित होती है। उन्हें अब देश से बाहर भी कार्यक्रमों के निमंत्रण मिल रहे हैं। पिछले दिनों जद्दा ( अरब देश ) और रियाज़ ( अरब देश ) में भी अपनी कामयाबी के झण्डे बुलन्द कर भारत का नाम रोशन किया । जहाँ तक मुशायरों का तआल्लुक है हिन्दुस्तान में जितने भी बड़े मुशायरे होते हैं मोहतरमा नुसरत मेंहदी को ज़रूर बुलाया जाता है और वह बड़ी नफासत के साथ मुशायरो में तशरीफ लाती है। मोहतरमा नुसरत मेंहदी की यह भी विशेषता है कि वह हिन्दी उर्दू और अंग्रेजी तीनों भाषाओ में लिखती है और तीनों भाषाओं का अच्छा ज्ञान भी रखती है। वर्तमान में मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी के सचिव के पद पर कार्यरत है। शायरी उनको पैतृक तौर पर वरसे में मिली है। उनकी दो बहनें शमीम ज़ोहरा और डॉ.मीना नकवी भी अच्छा शायरा है । नुसरत मेंहदी के पति भी एक अच्छे लेखक है । इसी के साथ-साथ इनके परिवार में अनेक लोग साहित्य जगत से जुड़े हुए है और साहित्य जगत की खिदमत में पूरा परिवार ही एक तरह से संलग्न है। नुसरत मेंहदी ने 1981 में पहली कहानी लिखी  मैं क्या हूँ  जिसका प्रसारण आकाशवाणी नज़ीराबाद से उसी वर्ष हुआ । शायरी की शुरूआत सन् 1982 से हुई उनकी पहली ग़ज़ल का मतला है – सन्नाटों के सीने से तूफ़ान उठा देंगे हम ऐसे समन्दर है जो आग लगा देंगे कई सेमीनारों में भाग लेकर मुल्क के अदबी फनकारों के फ़न और शिख्सयत पर मक़ाले पढ़े उनकी राही शहाबी अख्तर सईद खाँ इशरत क़ादरी नईम कौसर वसीम बरेलवी ज़फर नसीमी आदि शामिल है। इसी के साथ मन्ज़ूम ख़राजे तहसीन भी आपने पेश किये हैं उनमें अल्लामा इक़बाल ममनून हसन खाँ इक़बासल मजीद आदि शामिल है। शीघ्र ही उनकी उर्दू शायरी की पुस्तक & साया साया धूप & प्रकाशित हो रही है । कुछ शेर पेश है:- तारीकियों में सारे मनाज़िर चले गये जुगनू स्याह रात में सच बोलता रहा — -
- आबे हयात पी के कई लोग मर गये
हम ज़हर पी के जिन्दा है सुक़रात की तरह
– –
किसी एहसास में डूबी हुई शब
सुलगता भीगता आँगन हुई है
 – –
इससे पहले कि दास्ताँ हो जाऊँ
अपने ल़ज़ों में खुद बयाँ हो जाऊँ
- – –
तोल कर देख लें अज़मत की तराज़ू में
इसे मेरी चादर तेरी दस्तार से भारी होगी
– –
 अपनी बेचारगी को देख कर रोज़
 एक आईना न तोड़ा कर
– –
सलीबो दार से उतरी तो जिस्मों जाँ से मिली
मैं एक लम्हें में सदियों की दास्ताँ से मिली – - हर कोई देखता है हैरत से तुमने सबको बता दिया है क्या
– –
नुसरत मेंहदी के बारे में वरिष्ठ साहित्यकारों के विचार:-
 “ नुसरत मेंहदी शेरगोई की बारीकी से वाकिफ़ है । वह जानती है कि दो मिसरों का रास्ता कितना नज़ाकत और बारीकी का काम है । उन्होंने मुतअदिद अशआर के ज़रिये उर्दू ग़ज़लगोई में एक नए लहजे का इज़ाफा किया है।
                     –श्री मुमताज राशिद
“नुसरत दयारे सुखन में नव-वारिद है । मगर उनकी शायरी ये तहस्सुर ज़रूर देती है कि उनका शायराना वुजदान ग़ज़ल आशना है…….नुसरत मेंहदी की ग़ज़ल पढ़ते हुए खूबी भी नज़र आती है कि उन्होंने फैशनवाली निसाइयत पसन्दी को अपनी ग़ज़ल में राह नहीं दी ।
                         — जुबेर रिज़वी
“ मैं मोहतरमा नुसरत मेंहदी साहिबा को ऐसी शायराओं में शुमार करता हूँ जो शोहरत की हासिल करने का लालच किये बग़ैर अदब की इबादत कर रही है। –                   डॉ.कैलाश गुरूस्वामी
आखिर में यही कहा जा सकता है कि नुसरत मेंहदी उर्दू शायरात में न सिर्फ मुशायरों की हद तक कामयाब है बल्कि उर्दू अदब में भी अपना नुमाया बनाती जा रही है और उनका शुमार मुल्क की उभरती हुई शायरात में है। — सलीम कुरैशी 233- बी हाउसिंग बोर्ड कालोनी, करोद, भोपाल मोबा. 9425637960

‘किशोरीलाल की आत्महत्या’

‘किशोरीलाल की आत्महत्या’

a‘किशोरीलाल की आत्महत्या’ जिस तरह नारी विमर्श पर 1980 के दशक से विमर्श प्रारंभ हुआ ठीक उसी तरह से दलित विमर्श पर भी विमर्श प्रारंभ हुआ है।हालांकि साहित्तेतर यह विमर्श डा अंबेडकर से प्रारंभ हुआ है लेकिन महात्मा गाँधी से लेकर अब तक तमाम महात्माओं ने दलित उत्थान पर बहुत कहा है। आज जो स्थिति है वह पहले की तरह तो नहीं है फिर भी आंचलिक गाँवों में यह स्थिति ज्यों की त्यौं बनी हुई है।इसके लिए कौन जिम्मेदार है।कहा नहीं जा सकता।संभवतःयह मनुवादियों की देर है जो सदियों से चली आ रही है।इतनी आसानी से इससे निज़ाद पाना कठिन हैफिर भी प्रयास जारी है। दलितों को  भले ही इससे लाभ न मिला हो किन्तु दलितों के नाम से रोटियाँ खूब सेंकी जा रही है। दलित की परिभाषा बदल देनी चाहिए तब ही वास्तविक दलित को लाभ मिल सकता है। डा सोनाने ने दलितों की श्रेणियों को परखने की बात की है वास्तविक दलित की खोज जब तक नहीं होती यह समस्या बनी रहेगी।

निर्वासिता’

निर्वासिता’

a‘निर्वासिता’ नारी केन्द्रित यह कविता संग्रह पठनीय है। नारी मुक्ति आन्दोलन लगातार चल रहा है। सन् 1980 के बाद से  नारी विमर्श पर बहुत काम हो रहा है। यह विषद विषद है। इस सम्बन्ध में विस्तृत चर्चाएं लगातार चल रही है, चलती रहेगी। क्या वास्तव में नारी आजाद है यदि वह आजाद है तो अब तक वह आज़ाद क्यों नहीं हो पा रही है। जो आज़ादी नारियों को प्राप्त है उससे नारियों को लाभ कम किन्तु हानि अधिक हो रही है। आजादी के नाम पर या तो नारियों का शोषण हो रहा है या नारियाँ आजादी का अनुचित लाभ उठा रही है। जिन्हे वास्तव में आजादी की आवश्यकता है उन्हे आजादी नहीं मिल पा रही है। यदि देखा जाय तो नारी ही नारी की दुश्मन है।पुरूष अपनी ओर से कभी भी नारी को प्रताड़ित नहीं करता जब तक कि अन्य नारी पुरूष को नारी के विरूद्ध हथियार नहीं उठाती।नारियों ने अन्य नारी को प्रताड़ित करने के लिए पुरूष का सहारा लिया और पुरूषों पर नारियों की प्रताड़ना का आरोप लगाया जाता है। उदाहरण..सास बहु,देवरानी जेठानी,सौतेली माँए आदि।डा सोनाने ने ‘निर्वासिता’ में नारियों के चरित्र पर भी लिखा है सिक्के के दोनों पहलुओं को देखा है फिर लिखा है।

‘कोरी किताब

‘कोरी किताब

aजब ‘कोरी किताब ‘ की प्रति श्री चन्द्रकान्त देवताले जी के हाथों में पहुँची तो उन्होंने डा सोनाने को पत्र लिखकर  जताया कि उनके हाथों में आते आते कोरी किताब कविताओं से भर गई। किताब में भोपाल पर लिखा गीत बहुत लाजवाब हैः-.
          अय,शहरे भोपाल तुझको मेरा सलाम
            तेरी गलियों में बसा जन्नत का धाम..
भोपाल की गलियों में जन्नत बसा हुआ है। वास्तव में जो एक बार भोपाल आ जाता है ,वह भोपाल का ही होकर रह जाता है। हालाकि इस कविता संग्रह में गीत,ग़ज़ल,कविताएं आदि है। हृदय के किसी कोने में अवश्य ही यह किताब अपनी जगह बनाने की कोशिश में है।जल्द ही यह आरजू  भी पूरी हो जाएगी।

धूप में चाँदनी।

धूप में चाँदनी।

aaधूप में चाँदनी। इस सृष्टि में सबकुछ परिवर्तनशील है। ठीक उसी तरह साहित्य में भी परिवर्तन हो रहे है। कहानी से अ.कहानी,कविता से अ.कविता ,ठीक उसी तरह ग़ज़ल ने भी अपना मिज़ाज बदला है। इस बदलाव को अपनाते हुए डा शंकर सोनाने ने ग़ज़ल की ओर भी रूख अख्तियार किया है। अपने अन्दाज़ में ग़ज़ल कहने का उनका अन्दाज़ अलग ही किस्म का है। रस,अलंकार,प्रतीक,बिम्ब भी समय के अनुसार बदल गए है तो छन्द और पैमाने ने भी किनारा करना उचित समझा । अब यह कहा जाता है कि ग़ज़ल भले ही मीटर में न हो लेकिन वह गेय होनी चाहिए। 1980 के  दशक के बाद बोलचाल के वाक्यों को भी गेयता मिलने लगी है फिर नई विधा की ग़ज़ल को तो मिलनी ही चाहिए।इसी को नज़र रखते हुए डा सोनाने ने आज़ाद ग़ज़ल कहने की कोशिश की है ।अब यह कोशिश कहाँ तक कामयाब है, आप भी पढ़कर देख लें।

‘दो शब्दों के बीच

‘दो शब्दों के बीच

a‘दो शब्दों के बीच ‘ कविता संकलन में एक कविता है,विनय दुबे जब हंसते हैं। इस कविता को पढ़ते हुए विनय दुबे खूब हँसे थे इतना हँसे थे कि विजयबहादुर सिंह जी वास्तव में डांडिया करने लग गए थे। इस संकलन में विविध विषयों को समाहित किया गया है। सामाजिक,आर्थिक और राजनीति को खूब आड़े हाथों लिया है। अपने समय की प्रतिकूल और विषमताओं को अच्छी तरह से जानने में डा सोनाने ने कोई कोताही नहीं की है। यह सही है कि यह संकलन कुछ लोगों को भीतर तक चूभ जाता है तो अधिकतर लोगों को सहलाता भी है। मनुष्य की संवेदनाएं आज दोहरी हो गई है।भीतर कुछ है तो बाहर कुछ है। डा सोनाने इसे खूब अच्छी तरह से जानते है। बोलते बहुत कम है तो वार उससे अधिक करते है।
    हाँ,इस संग्रह में भोपाल के कवियों को ताज़ पहनाने में पीछे नहीं रहे हैं । पूर्णचन्द्र रथ ने कभी सिगरेट नहीं पी किन्तु पर लिखी कविता को पढ़कर उन्होने भी एक बार सिगरेट का स्वाद अवश्य चखा है। अतः कविता वही होती है जो अन्तःकरण में पहुँचकर पाठक को उत्तेजित कर दें।डा सोनाने यहाँ सफल होते है।

वेदना

वेदना

aप्रसिद्ध साहित्यकार प्रो अक्षय कुमार जैन ने ठीक ही कथा कि डा शंकर सोनाने प्रेम के कवि है। ‘ वेदना ‘ प्रबंध काव्य के प्रथम संस्करण का प्रकाशन 1976 में हुआ था जिस समय उनकी आयु मात्र चौबीस वर्ष की थी। प्रख्यात समीक्षक,किसी, ने कहा था कि ‘ वेदना ‘ पढ़कर हमें ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि वे जयशंकर प्रसाद की कृति ‘आँसू’ पढ़कर प्रतीत होता है। ‘ वेदना ‘प्रबंध काव्य पढ़ना ही ‘आँसू’ पढ़ने जैसा है। इस अव्दितीय कृति की ओर अभी तक किसी का ध्यान नहीं गया है। अनेकों बार पढ़ने के लिए मन करता है।

क्रोध

क्रोध

aबड़ों के लिए लिखना जितना आसान होता है उससे कहीं अधिक कठीन होता है बच्चों के लिए लिखना ।डा कृष्णशंकर सोनाने ने बच्चों की ओर भी ध्यान दिया और उन्होंने बच्चों के लिए  शिक्षाप्रद कहालियाँ लिखी । यह कहानियाँ न केवल बच्चों को शिक्षा देती है बल्कि बड़ों का ध्यान भी अपनी ओर आकर्षित करती है।

कुदरत का न्याय

कुदरत का न्याय

aबड़ों के लिए लिखना जितना आसान होता है उससे कहीं अधिक कठीन होता है बच्चों के लिए लिखना ।डा कृष्णशंकर सोनाने ने बच्चों की ओर भी ध्यान दिया और उन्होंने बच्चों के लिए  शिक्षाप्रद कहालियाँ लिखी । यह कहानियाँ न केवल बच्चों को शिक्षा देती है बल्कि बड़ों का ध्यान भी अपनी ओर आकर्षित करती है।

उपन्यास ‘ गौरी ‘


 उपन्यास ‘ गौरी ‘

aडा कृष्णशंकर सोनाने व्दारा लिखा गया उपन्यास ‘ गौरी ‘यह उपन्यास उनके व्दारा सन् 1985 में लिखा गया है किन्तु इस उपन्यास का प्रकाशन बीस वर्ष बाद 2007 में संभव हो पाया। ‘गौरी’उपन्यास नारी उत्पीड़न तथा शौर्य की अद्भुत दास्तान है। ग्रामीण परिवेश में भी नारी किस तरह अपने अधिकार के लिए लड़की है।असामाजिकता के बीच जीवित रहते हुए ठीक उसी तरह अपने कर्तव्य का पालन करती है जिस तरह पिता का आज्ञाकारी पुत्र करता है।पुत्र भले ही माता पिता के प्रति विमुख हो जाता है लेकिन ममतामयी बेटी कभी भी विमुख नहीं हुई है।  इतिहास गवाह है बेटियाँ अपने माता पिता ही नहीं बल्कि अपने परिवार के प्रति अधिकतर उत्तरदायित्व निभाते हुए पाई जाती है। गौरी भी एक ऐसा ही चरित्र है। उपन्यास पठनीय होने के साथ साथ संग्रहीणीय भी है।

संवेदनाओं के स्वर

‘संवेदनाओं के स्वर

aडा कृष्णशंकर सोनाने व्दारा रचित कविताओं का संग्रह ‘ बौराया मन ‘। डा सोनाने विशेषतः प्रेम के कवि है।मानवीय और सामाजिक संवेदनाओं और सरोकारों का अनूठा संगम ‘बौराया मन ‘ में देखने को मिलेगा।’बौराया मन ‘ को पढ़कर प्रसिद्ध साहित्यकार श्री अक्षय कुमार जैन ने कहा,डा सोनाने वस्तुतः प्रेम के कवि है,उनकी लेखनी में मानवीय संवेदनाओं की भरमार है।ऐसा लगता है,सारा विश्व उनमें समाया हुआ है। ‘बौराया मन ‘ की तरह डा कृष्णशंकर सोनाने ने ‘संवेदनाओं के स्वर ‘ कविता संग्रह में भी अपना सारा प्रेम विश्व पर उढे़ल दिया है। उक्त दोनों कृतियाँ न केवल पठनीय है बल्कि संग्रहणीय है। प्रेम क्या होता है,यदि आपको जानना है तो डा कृष्णशंकर सोनाने की कविताओं में देखने को मिलेगा।

बौराया मन

‘बौराया मन

aडा कृष्णशंकर सोनाने व्दारा रचित कविताओं का संग्रह ‘ बौराया मन ‘। डा सोनाने विशेषतः प्रेम के कवि है।मानवीय और सामाजिक संवेदनाओं और सरोकारों का अनूठा संगम ‘बौराया मन ‘ में देखने को मिलेगा।’बौराया मन ‘ को पढ़कर प्रसिद्ध साहित्यकार श्री अक्षय कुमार जैन ने कहा,डा सोनाने वस्तुतः प्रेम के कवि है,उनकी लेखनी में मानवीय संवेदनाओं की भरमार है।ऐसा लगता है,सारा विश्व उनमें समाया हुआ है।

गुरूवाणी’

गुरूवाणी’

aएक साहित्यकार महज़ इतना भर नहीं होता कि वह समाज और आसपास तक ही देखता हो बल्कि वह बाह्य जगत के अलावा आन्तरिक जगत के भीतर  भी झाँकने की कोशिश करता है। भौतिक जगत के अलावा भी एक ऐसा विश्व है जिसे केवल अन्तःचक्षुओं से ही देखा जा सकता है।’गुरूवाणी’एक ऐसी ही कृति है जिसमें गुरूजी के उन सभी प्रवचनों को शामिल किया गया है जो बाहर से यानी भौतिक जगत से आन्तरिक जगत तक ले जाकर आत्मा को सर्वोच्च शिखर पर प्रतिष्ठित करता है। पुस्तक का कलेवर हृदयंगम करना इतना आसान है कि कम पढ़ा व्यक्ति भी अपने एवं अपने आसपास के लोगों को समझा सकता है और बाह्य से भीतर की ओर जाकर कल्याण की ओर प्रकाश की ओर और अमृतत्व की ओर बढ़ता है।

जब मैं प्रेम करती हूँ

जब मैं प्रेम करती हूँ

सारी दुनिया अपनी सी लगती है
सब कुछ समर्पित करने लगती हूँ
भरने लगती हूँ
पेड़,पौधों तितलियों और इन्द्रधनुष में रंग
फूलों में भरती हूँ सुगन्ध
जलने लगते है आँखों के चिराग
कर देती हूँ सारे माहौल को खुशहाल।।
जब मैं प्रेम करती हूँ
सितारों में भर देती हूँ रोशनी
चाँद निखर जाता है मुझे देख
निखर जाती है शरद की रात
भरती हूँ झरने में संगीत
होने लगता है प्राणों में संचार
दुनिया हो जाती है रंगीन।।
जब मैं प्रेम करती हूँ
लगता है जीवन खिलने
गूँज उठती है कृष्ण की बांसुरी
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में।।

poem-भेड़िए कभी छिपते नहीं

poem-भेड़िए कभी छिपते नहीं

भेड़िए कभी छिपते नहीं
दोस्त बनकर
दुश्मन जब
आपस में मिलना शुरू कर दे
करें मि़त्रों की तरह व्यवहार
लगे रिश्तों मे अपनापन।
दोस्त बनकर
जब दुश्मन
जागरूक हो जाए
पेश आए सावधानी से
मागने लगे दुहाईयां
लगे मिमियाने भेड़ों की तरह।
दोस्त बनकर
जब दुश्मन
उतारने लगे बलैया
तारीफों के लगे बांधने पुल
करने लगे मित्रों की बुराइया।
दोस्त बनकर
दुश्मन जब
वर्जनाएं लगे तोड़ने
पहनने लगे जामा सभ्यता का
धतियाने लगे परम्पराएं
लगे बिचकाने मुंह
दिखाकर अपनापन ।
दोस्त बनकर
जब दुश्मन
चढ़ाने लगे मनौतियां
पहनाने लगे माला फूलों की
लगाने लगे मरहम घावों पर
बगल में छिपाए हुए कटारी से
छिलने लगे तलवें
लगे खोजने अर्थ मतलब के।
दोस्त बनकर
दुश्मन जब
मिलने लगे आपस में गलें
साम्प्रदायिकों सी चले चालें
सभ्यता का दुशाला ओढ़े हुए ।
आज हमारे बीच से ही
कुछ दुश्मन कर रहे होंगे
एक दूसरे के खिलाफ
एक दूसरे के लिए
घिनौना संघर्ष…
दोस्त बनकर
अपनत्व दिखाएं
शेर की खाल में
भेड़िए छिपते नहीं ।
0