रविवार, 20 नवंबर 2011

जब मैं प्रेम करती हूँ

जब मैं प्रेम करती हूँ

सारी दुनिया अपनी सी लगती है
सब कुछ समर्पित करने लगती हूँ
भरने लगती हूँ
पेड़,पौधों तितलियों और इन्द्रधनुष में रंग
फूलों में भरती हूँ सुगन्ध
जलने लगते है आँखों के चिराग
कर देती हूँ सारे माहौल को खुशहाल।।
जब मैं प्रेम करती हूँ
सितारों में भर देती हूँ रोशनी
चाँद निखर जाता है मुझे देख
निखर जाती है शरद की रात
भरती हूँ झरने में संगीत
होने लगता है प्राणों में संचार
दुनिया हो जाती है रंगीन।।
जब मैं प्रेम करती हूँ
लगता है जीवन खिलने
गूँज उठती है कृष्ण की बांसुरी
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में।।

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