रविवार, 20 नवंबर 2011

गुरूवाणी’

गुरूवाणी’

aएक साहित्यकार महज़ इतना भर नहीं होता कि वह समाज और आसपास तक ही देखता हो बल्कि वह बाह्य जगत के अलावा आन्तरिक जगत के भीतर  भी झाँकने की कोशिश करता है। भौतिक जगत के अलावा भी एक ऐसा विश्व है जिसे केवल अन्तःचक्षुओं से ही देखा जा सकता है।’गुरूवाणी’एक ऐसी ही कृति है जिसमें गुरूजी के उन सभी प्रवचनों को शामिल किया गया है जो बाहर से यानी भौतिक जगत से आन्तरिक जगत तक ले जाकर आत्मा को सर्वोच्च शिखर पर प्रतिष्ठित करता है। पुस्तक का कलेवर हृदयंगम करना इतना आसान है कि कम पढ़ा व्यक्ति भी अपने एवं अपने आसपास के लोगों को समझा सकता है और बाह्य से भीतर की ओर जाकर कल्याण की ओर प्रकाश की ओर और अमृतत्व की ओर बढ़ता है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें