
‘किशोरीलाल की आत्महत्या’ जिस तरह नारी विमर्श पर 1980 के दशक से विमर्श प्रारंभ हुआ ठीक उसी तरह से दलित विमर्श पर भी विमर्श प्रारंभ हुआ है।हालांकि साहित्तेतर यह विमर्श डा अंबेडकर से प्रारंभ हुआ है लेकिन महात्मा गाँधी से लेकर अब तक तमाम महात्माओं ने दलित उत्थान पर बहुत कहा है। आज जो स्थिति है वह पहले की तरह तो नहीं है फिर भी आंचलिक गाँवों में यह स्थिति ज्यों की त्यौं बनी हुई है।इसके लिए कौन जिम्मेदार है।कहा नहीं जा सकता।संभवतःयह मनुवादियों की देर है जो सदियों से चली आ रही है।इतनी आसानी से इससे निज़ाद पाना कठिन हैफिर भी प्रयास जारी है। दलितों को भले ही इससे लाभ न मिला हो किन्तु दलितों के नाम से रोटियाँ खूब सेंकी जा रही है। दलित की परिभाषा बदल देनी चाहिए तब ही वास्तविक दलित को लाभ मिल सकता है। डा सोनाने ने दलितों की श्रेणियों को परखने की बात की है वास्तविक दलित की खोज जब तक नहीं होती यह समस्या बनी रहेगी।
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