
‘दो शब्दों के बीच ‘ कविता संकलन में एक कविता है,विनय दुबे जब हंसते हैं। इस कविता को पढ़ते हुए विनय दुबे खूब हँसे थे इतना हँसे थे कि विजयबहादुर सिंह जी वास्तव में डांडिया करने लग गए थे। इस संकलन में विविध विषयों को समाहित किया गया है। सामाजिक,आर्थिक और राजनीति को खूब आड़े हाथों लिया है। अपने समय की प्रतिकूल और विषमताओं को अच्छी तरह से जानने में डा सोनाने ने कोई कोताही नहीं की है। यह सही है कि यह संकलन कुछ लोगों को भीतर तक चूभ जाता है तो अधिकतर लोगों को सहलाता भी है। मनुष्य की संवेदनाएं आज दोहरी हो गई है।भीतर कुछ है तो बाहर कुछ है। डा सोनाने इसे खूब अच्छी तरह से जानते है। बोलते बहुत कम है तो वार उससे अधिक करते है।
हाँ,इस संग्रह में भोपाल के कवियों को ताज़ पहनाने में पीछे नहीं रहे हैं । पूर्णचन्द्र रथ ने कभी सिगरेट नहीं पी किन्तु पर लिखी कविता को पढ़कर उन्होने भी एक बार सिगरेट का स्वाद अवश्य चखा है। अतः कविता वही होती है जो अन्तःकरण में पहुँचकर पाठक को उत्तेजित कर दें।डा सोनाने यहाँ सफल होते है।
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