गेशे जप्पा उपन्यास : डा नीरजा माधव
उपन्यास की शक्ल में उतरा तिब्बत का दर्द । निरन्तर में डा निरता का उपन्यास पाठ
अक्सर कहा जाता है कि कहानी और कविता का रिश्ता दिल से ज्यादा होता है ,उपन्सास भी इस मिथक से अछूता नहीं है । कभी कभी उपन्यास की विधा भाव प्रधान से ज्यादा विचार प्रधान रूप में सामने आती है जिसमें पाठकों के लिए सर्वथा जुदा अनुभव होता है।
प्रबुद्ध पाठक वर्ग ऐसे ही अनुभव से गुजरा है। मोका था स्वराज भवन,भोपाल में आयोजित ‘निरन्तर ‘श्रृंखाला के तहत हुए डा नीरजा माधव का उपन्यास पाठ । मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी ने मशहूर उपन्यासकार डा नीरजा माधव के उपन्यास ” गेशे जप्पा ‘ का पाठ । इस अवसर पर कथाकार मालती जोशी उपस्थित थी । अपने आप में यह उपन्यास न केवल तिब्बत की छटपटाहट को व्यक्त करता है बल्कि तिब्बत के प्रति विश्व स्तर पर छाई चुप्पी की तरफ भी इशारा करता है ।यह सच है कि शताब्दियों से बोद्ध धर्म की परंपराऔं,आस्थाऔं,निष्ठाऔं के प्रति समर्पित यह देश सेकुलर देशों की भीड मे अपना एक चरि़त्र रखता है । धार्मिक और सामाजिक स्तर पर भी इस देश के अपने संस्कार है । इन सभी राजनीतिक,सांस्कतिक और भोगोलिक बिन्दुओं को कथारस में समेटता यह उपन्यास इस पूरे मामलs पर कई विचारणीय प्रश्न छोडता है ।
मालती जोशी ने इसे अव्दितिय उपन्यास बताया । इस जरिये उपन्यासकार राष्टीय और अंतराष्टीस विचारों और चुनोतियों के प्रति सजग दिखाई देती है। डा शंकर सोनाने ने कहा कि यह उपन्या रवीन्द्रनाथा टैगोर के उपन्यास ‘ गोरा ‘ की याद दिलाता है । महाश्वेता देवी ने भी बंगाल में आदिवासियों के हित संरक्षण के लिए इसी तरह का कार्य किया है। तिब्बत समस्सा लेकर डा सोनाने ने 1975 मे लगभगग दस हजार लोगों से मतदान प्राप्त कर नेपाल सरकार को भेजे थे ,जो अब बहुत पुरानी बात हो गई है । उन्होने डा नीरता के उपन्यास गेसै जप्पा के फिल्मांकन की बात भी की कि इस उपन्यास पर बेहतर फिल्म सकती है । इसे सरकार बना सकती है या कोई निदेशक ।
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