रविवार, 20 नवंबर 2011

poem-भेड़िए कभी छिपते नहीं

poem-भेड़िए कभी छिपते नहीं

भेड़िए कभी छिपते नहीं
दोस्त बनकर
दुश्मन जब
आपस में मिलना शुरू कर दे
करें मि़त्रों की तरह व्यवहार
लगे रिश्तों मे अपनापन।
दोस्त बनकर
जब दुश्मन
जागरूक हो जाए
पेश आए सावधानी से
मागने लगे दुहाईयां
लगे मिमियाने भेड़ों की तरह।
दोस्त बनकर
जब दुश्मन
उतारने लगे बलैया
तारीफों के लगे बांधने पुल
करने लगे मित्रों की बुराइया।
दोस्त बनकर
दुश्मन जब
वर्जनाएं लगे तोड़ने
पहनने लगे जामा सभ्यता का
धतियाने लगे परम्पराएं
लगे बिचकाने मुंह
दिखाकर अपनापन ।
दोस्त बनकर
जब दुश्मन
चढ़ाने लगे मनौतियां
पहनाने लगे माला फूलों की
लगाने लगे मरहम घावों पर
बगल में छिपाए हुए कटारी से
छिलने लगे तलवें
लगे खोजने अर्थ मतलब के।
दोस्त बनकर
दुश्मन जब
मिलने लगे आपस में गलें
साम्प्रदायिकों सी चले चालें
सभ्यता का दुशाला ओढ़े हुए ।
आज हमारे बीच से ही
कुछ दुश्मन कर रहे होंगे
एक दूसरे के खिलाफ
एक दूसरे के लिए
घिनौना संघर्ष…
दोस्त बनकर
अपनत्व दिखाएं
शेर की खाल में
भेड़िए छिपते नहीं ।
0

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें